बाज लोगो नें मनहर को पागल करार दे दिया, चुनाँचे उसको हिरासत में लेकर अदालत लाया गया, मुंसिफ के आगे पेश किया गया, पागल नें अपना पक्ष रखा और सबको यक़ीन दिला दिया कि वो पागल नहीं हैं।।
पर अगले ही लम्हा, इस्मत याफ़्ता ख़वातीन को एक नाक़ाबिल-ए-बरदाश्त तकलीफ हो गयीं और सब अपनी बगले झाँकने लगे और फुसफुसाने लगे,
"अग़र ये पागल नहीं हैं तोह क्या?"
फ़ैसले की घड़ी आयी, मनहर को पागल घोषित कर पागलखाने भेजना मुकर्रर हुआ।
चुनाँचे अब नशे के टीके और दिमागी करंट की मदद से उसके दिमाग से खुद को पागल साबित न करने का फ़ितूर उतर गया।
काफ़ी अरसे बाद, अब बख्तरबंद किले जैसे पागलखाने में मनहर के कई दोस्त हैं जिनके साथ वो आज़ाद महसूस करता हैं और अब....
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